Monday, September 27, 2021

चाँद के बारे में बहुत ही दिलचस्प और महत्वपूर्ण बातें / Very interesting and important things about the moon.

जानिए चाँद के बारे में बहुत ही रोचक और महत्वपूर्ण बातें


चंद्रमा का बुनियादी ज्ञान : चन्द्रमा पृथ्वी का एक अकेला  प्राकृतिक उपग्रह है। यह सौर मंडल का पाँचवां,सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है। इसका आकार बास्केट बॉल की तरह गोल है। चाँद की चमक सूरज की वजह से प्रकाशित होती है। पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी 384,403 किलोमीटर है। यह दूरी पृथ्वी के व्यास का 30 गुना है। चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 1/6 है। यह पृथ्वी कि परिक्रमा 27.3 दिन में पूरा करता है और अपने अक्ष के चारो ओर एक पूरा चक्कर 27.3 दिन में लगाता है। यही कारण है कि हमें चाँद का एक ही हिस्सा या एक ही फेस दिखाई देता हे पृथ्वी से। यदि चन्द्रमा पर खड़े होकर पृथ्वी को देखे तो पृथ्वी साफ़ साफ़ अपने अक्ष पर घूर्णन करती हुई नजर आएगी लेकिन आसमान में उसकी स्थिति सदा स्थिर बनी रहेगी अर्थात पृथ्वी को कई वर्षो तक निहारते रहो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं होगी। पृथ्वी- चन्द्रमा-सूर्य ज्यामिति के कारण "चाँद की दिशा " हर 29.5 दिनों में बदलती है। आकार के हिसाब से अपने समान ग्रहों की अपेक्षा यह सौरमंडल में सबसे बड़ा प्राकृतिक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी का एक चौथाई तथा द्रव्यमान 1/81 है। बृहस्पति के एक उपग्रह के बाद चन्द्रमा दूसरा सबसे अधिक घनत्व वाला उपग्रह है। सूर्य के बाद आसमान में सबसे अधिक चमकने वाला केवल चन्द्रमा है। समुंद्र में ज्वार और भाटा चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण आते हैं। चन्द्रमा की अस्थायी कक्षीय दूरी, पृथ्वी के व्यास का 30 गुना है इसी कारन आसमान में सूर्य और चन्द्रमा का आकार हमेशा सामान नजर आता है। पथ्वी से चंद्रमा का 59 % भाग दिखता है जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में घूमता हुआ सूर्य और पृथ्वी के बीच से होकर गुजरता है और सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है तो उसे सूर्यग्रहण कहते हैं।

चंद्र यान : अभी तक अन्तरिक्ष में मानव सिर्फ चाँद पर ही अपने कदम रख पाया है। सोवियत राष्ट् का Luna-1 first अन्तरिक्ष का पहला यान था, जो चन्द्रमा के पास से गुजरा था लेकिन लूना-2 पहला यान था जो चन्द्रमा की धरती पर उतरा था। सन् 1968 में केवल नासा अपोलो कार्यक्रम ने उस समय मानव मिशन भेजने की उपलब्धि हासिल की थी, और पहली मानवयुक्त ' चंद्र परिक्रमा मिशन ' की शुरुआत अपोलो-8 के साथ की गई। सन् 1969 से 1972 के बीच छह मानवयुक्त यान ने चन्द्रमा की धरती पर कदम रखा जिसमे से अपोलो-11 ने सबसे पहले कदम रखा। इन मिशनों ने वापसी के दौरान 380 कि. ग्रा. से ज्यादा चंद्र चट्टानों को साथ लेकर लौटे जिसका इस्तेमाल चंद्रमा की उत्पत्ति, उसकी आंतरिक संरचना के गठन और उसके बाद के इतिहास की विस्तृत भूवैज्ञानिक समझ को विकसित करने के लिए किया गया। ऐसा माना जाता है कि करीब 4.5 अरब वर्ष पहले पृथ्वी के साथ विशाल टक्कर की घटना ने इसका गठन किया है। सन् 1972 में अपोलो-17 मिशन के बाद से चंद्रमा का दौरा केवल मानवरहित अंतरिक्ष यान के द्वारा ही किया गया जिसमें से विशेषकर अंतिम सोवियत लुनोखोद रोवर द्वारा किया गया है। सन् 2004 के बाद से जापान, चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी में से प्रत्येक ने चंद्र परिक्रमा के लिए यान भेजा था। इन अंतरिक्ष अभियानों ने चंद्रमा पर जल-बर्फ की खोज की पुष्टि के लिए विशिष्ठ योगदान दिया है। चंद्रमा के लिए भविष्य की मानवयुक्त मिशन योजना सरकार के साथ साथ निजी वित्त पोषित प्रयासों से बनाई गई है। चंद्रमा ' बाह्य अंतरिक्ष संधि ' के तहत रहता है जिससे यह शांतिपूर्ण उद्देश्यों की खोज के लिए सभी राष्ट्रों ( देशों ) के लिए मुक्त है। चन्द्रयान (अथवा चंद्रयान-1) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम के अंतर्गत द्वारा चंद्रमा की तरफ कूच करने वाला भारत का पहला अंतरिक्ष यान था। चन्द्रमा को जीवाष्म ग्रह भी कहते है।

पानी की उपस्थिति : 2008 में चंद्रयान अंतरिक्ष यान ने चन्द्रमा की सतह पर जल बर्फ के अस्तित्व की पुष्टि की है। नासा ने इसकी पुष्टि की है।

चुम्बकीय क्षेत्र : चंद्रमा का करीब 1-100 नैनोटेस्ला का एक बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र है। पृथ्वी की तुलना में यह सौवें भाग से भी कम है।

चाँद की उत्पत्ति : अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाए गए पत्‍थरों की जांच से पता चला है कि चंद्रमा और धरती की उम्र में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। इसकी चट्टानों में टाइटेनियम की मात्रा अत्यधिक पाई गई है। अन्य प्रस्तावित परिस्थितियों में कब्जा निकाय, विखंडन, एक साथ एकत्रित (संक्षेपण सिद्धांत), ग्रहों संबंधी टकराव (क्षुद्रग्रह जैसे शरीर से बने), और टकराव सिद्धांत शामिल हैं। मानक विशाल-प्रभाव परिकल्पना मंगल ग्रह के आकार के शरीर को बताती है, थिआ कहलाता है, जिस कारण पृथ्वी पर असर पड़ा और पृथ्वी के चारों ओर एक बड़ी मलबे की अंगूठी पैदा हुई, जिसके बाद उस मलबे ने चंद्रमा के रूप में प्रवेश किया । इस टकराव के कारण पृथ्वी के 23.5 डिग्री झुका हुआ धुरी भी उत्पन्न हुई, जिससे मौसम उत्पन्न हो गया। चंद्रमा के ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात पृथ्वी के लिए अनिवार्य रूप से समान दिखते हैं। ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात, जिसे बहुत ठीक मापा जा सकता है, प्रत्येक सौर मंडल निकाय के लिए एक अद्वितीय और विशिष्ट हस्ताक्षर उत्पन्न करता है। अगर थिया एक अलग प्रोटॉपलैनेट था, तो शायद पृथ्वी से एक अलग ऑक्सीजन आइसोटोप हस्ताक्षर होता, जैसा कि अलग-अलग मिश्रित पदार्थ होता।  इसके अलावा, चंद्रमा के टाइटेनियम आइसोटोप अनुपात (50Ti / 47Ti) पृथ्वी के करीब (4 पीपीएम के भीतर) प्रतीत होता है। चाँद लगभग 4.5 करोड़ वर्ष पूर्व धरती और थीया ग्रह (मंगल के आकार का एक ग्रह) के बीच हुई भीषण टक्कर से जो मलबा पैदा हुआ, उसके अवशेषों से बना था। यह मलबा पहले तो धरती की कक्ष में ही घूमता रहा और फिर धीरे-धीरे एक जगह इकट्टा होकर चांद की शक्ल में बदल गया। 

चाँद पर अब तक क्या पाया गया है : चंद्रमा पर कई गहरे गड्डे और ऊँचे पर्वत पठार है। चाँद की सहत पर बेहद खुरदुरी भूमि,अस्‍थिर और हल्की वायुमंडल होने की संभावना मिली है।और यहां पर पानी का भी ठोस रूप से मौजूद होने के प्रमाण मिले हैं। हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार यह वायुमंडलविहीन उपग्रह है। नासा के एलएडीईई प्रोजेक्ट के मुताबिक यह हीलियम, नीयोन और ऑर्गन गैसों से बना हुआ है। चंद्रमा का सबसे बड़ा पर्वत दक्षिणी ध्रुव पर स्थित लीबनिट्ज पर्वत है, जो 35,000 फुट (10,668 मी.) ऊंचा है। चंद्रमा पर वातावरण नहीं है इसलिये चंद्रमा पर कोई आवाज सुनाई नहीं देती। यंहा के वायुमंडल में जल्दी-जल्दी परिवर्तन होते रहते है चाँद की सतह पर धूल के गुब्बारे सूरज के उदय होने और अस्त होने पर बनते है। ऐसा होने का एक कारण अणुओं का इलेक्ट्रिकली चार्ज होना मन जाता है। चाँद के पिछले भाग की धूल के मैदान को शांतिसागर कहते हैं, जो अंधकारमय है।

चाँद के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु :

  1. सौर मंडल में बहुत सारे चंद्रमा मौजूद हैं और हमारा चंद्रमा पाँचवा सबसे बड़ा चंद्रमा है ।
  2. चन्द्रमा पर आसमान हमेशा काला दिखाई देता है।
  3. चंद्रमा धरती से हर साल 3.8 सेंटी मीटर दूर होता जा रहा है
  4. अगर सूरज ना होता तो हम कभी चंद्रमा को भी नहीं देख पाते।
  5. चंद्रमा पर 6 झंडे गाढ़े जा चुके हैं जिनमें से 5 अभी भी गढे हुए हैं।
  6. बुज एल्ड्रिन (Buzz Aldrin) चंद्रमा पर पेशाब करने वाले पहले व्यक्ति हैं।
  7. अगर चंद्रमा नहीं होता तो धरती पर दिन केवल 6 घण्टे का होता।
  8. चंद्रमा की मिटटी में बारूद जैसी गंध आती है।
  9. चंद्रमा पर जाने वाले वैज्ञानिकों को आइसलैंड में ट्रेनिंग दी जाती है।
  10. चंद्रमा धरती का इकलौता प्राकृतिक उपग्रह है।
  11. चाँद 27 दिन, 7 घंटे, 43 मिनट, 11.6 सेकेण्ड में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है।
  12. चंद्रमा पूर्व में उगता है और पश्चिम में छिपता है।
  13. चंद्रमा का अध्ययन करने वाले विज्ञान को Selenology कहा जाता है ।
  14. चाँद के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में 1.3 सेकण्ड का समय लगता है।
  15. पृथ्वी पर होने वाले ज्वार भाटा, चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण की वजह से ही होते हैं।
  16. रॉकेट से चंद्रमा तक जाने में 13 घंटे लगते हैं। इतनी दूर कार से जाने में करीब 130 दिन लगेंगे।
  17. चन्द्रमा के पास अपनी रौशनी नहीं है। चंद्रमा सूरज की रौशनी से ही प्रकाशित होता है।
  18. चाँद पर पहुँचने वाले सबसे पहले वैज्ञानिक नील आर्मस्ट्रॉन्ग (1969) हैं और Gene Cernan (1972) सबसे आखिरी वैज्ञानिक हैं। उसके बाद से अभी तक चाँद पर कोई नहीं गया। 
  19. चंद्रमा पर वातावरण ना होने की वजह से सूर्य की पराबैंगनी किरणें और कॉस्मिक किरणें सीधे अंदर पहुँच जाती हैं इसीलिए चंद्रमा पर दिन में तापमान 107 डिग्री सेल्सियस हो जाता है जो बहुत ज्यादा गर्म है। और वातावरण न होने की वजह से ही रात को तापमान -153 डिग्री सेल्सियस हो जाता है यानि भयंकर सर्दी, इसलिए चंद्रमा पर जीवों की उत्पत्ति अभी संभव नहीं है।
  20. चंद्रमा पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के पाँव के निशान आज भी बने हुए हैं और वैज्ञानिक मानते हैं कि 10 करोड़ साल तक ये निशान ऐसे ही बने रहेंगे क्योंकि चंद्रमा पर हवा नहीं है जो पैर के निशान मिटा सके।
  21. चंद्रमा पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) धरती के गुरुत्वाकर्षण से 6 गुना कम है यानि चंद्रमा पर 60 किलो के इंसान का वजन केवल 10 किलो ही बैठेगा।

चंद्रमा के चार दृषिय :

पृथ्वी की ओर वाली चन्द्रमा की सतह
पृथ्वी के विरुद्ध (अदृश्य) वाली चन्द्रमा की सतह
चंद्रमा का उत्तरी ध्रुव
चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव






कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :

उपनाम : विशेषण :- लूनर, सेलेनिक

कक्षीय विशेषताएँ:-

पेरिएप्सिस :- 362 600 किलोमीटर (356 400–370 400 किलोमीटर)

एपोऐप्सिस :- 405 400 किलोमीटर (404 000–406 700 किलोमीटर)

अर्ध मुख्य अक्ष :- 3,84,399 किलोमीटर  (0.00257 AU)

विकेन्द्रता :- 0.0549

परिक्रमण काल :- 27.321661 दिन (27 दिन 7 घंटे 43 मिनट्स 11.5 सेकण्ड)

संयुति काल :- 29.530589 दिन (29 दिन 12 घंटे 44 मिनट्स 2.9 सेकण्ड)

औसत परिक्रमण गति :- 1.022 किमी/सेकंड

झुकाव :- 5.145° क्रांतिवृत्त से (पृथ्वी की भूमध्य रेखा से 18.29° और 28.58° के बीच)

आरोही ताख का रेखांश :- 18.6 वर्षों में एक क्रांति द्वारा पुन: आना

उपमन्द कोणांक :- 8.85 वर्षों में एक बढ़ना

स्वामी :- ग्रह पृथ्वी

भौतिक विशेषताएँ :-

माध्य त्रिज्या :- 1,737.10 किमी  (0.273 पृथ्वी)

विषुवतीय त्रिज्या :- 1,738.14 किमी (0.273 Earths)

ध्रुवीय त्रिज्या :- 1,735.97 किमी  (0.273 पृथ्वी)

सपाटता :- 0.00125

परिधि :- 10,921 किमी (equatorial)

तल-क्षेत्रफल :- 3.793 किमी2  (0.074 पृथ्वी)

आयतन :- 2.1958 किमी3  (0.020 पृथ्वी)

द्रव्यमान :- 7.3477 किलोग्राम  (0.012300 पृथ्वी)

माध्य घनत्व :- 3.3464 g/cm3

विषुवतीय सतह गुरुत्वाकर्षण :- 1.622 m/s2 (0.165 4 g)

पलायन वेग :- 2.38 km/s

नाक्षत्र घूर्णन :- काल 27.321582 d (समकालिक)

विषुवतीय घूर्णन वेग :- 4.627 m/s

अक्षीय नमन :- 1.5424° (क्रांतिवृत्त से) 6.687° (कक्षीय तल)

अल्बेडो :- 0.136

सतह का तापमान :- equator 85°N

न्यून माध्य अधि :-

00 के 220 के 390 के

70 के 130 के 230 के

सापेक्ष कांतिमान :- 2.5 to −12.9 −12.74 (माध्य पूर्ण चंद्र)

कोणीय व्यास :- 29.3 से 34.1 आर्क मीनट वायु-मंडल

सतह पर दाब :- 10−7 Pa (दिन),10−10 Pa (रात)

आधा चांद क्यों दिखता है?

जब पृथ्वी चाँद और सूरज के बीच होती है तो, सूरज की जितनी रौशनी चाँद पर पड़ती है हमें चाँद उतना ही दिखाई देता है बाकी का चाँद पृथ्वी की छाया पड़ने से काला हो जाता है और काले आकाश में मिश्रित होने की वजह से हमें चाँद आधा दिखाई देता है। और जब सूर्य की किरणें सीधी चाँद पर पूरी पड़ती है उस समय पृथ्वी की छाया चाँद पर नहीं पड़ती तब चाँद पूरा दिखता है।

पृथ्वी से चंद्रमा कितना गुना बड़ा है?

पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी 384,403 किलोमीटर है। यह दूरी पृथ्वी के व्यास का 30 गुना है। चंद्रमा पृथ्वी से बड़ा नहीं है। चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से लगभग 1/6 गुना है। 

धन्यवाद लेख को पूरा पढ़ने के लिए, अन्य किसी प्रकार की जानकारी को प्राप्त करने के लिए हमे कमेंट कीजिये, हम आपके लिए आपकी सुविधा और नॉलेज के मुताबिक लेख लाएंगे। 

D.T


Tuesday, September 21, 2021

सोलर सिस्टम और सौरमंडल के बारे में पूरी जानकारी

जानिए नव ग्रह के बारे में महत्वपूर्ण  जानकरी :

सौर मंडल उम्र (Age) : 4.6 अरब साल (Billion Years)
सौर मंडल ग्रह (Planets): 8 (Mercury, Venus, Earth, Mars, Jupiter, Saturn, Uranus, Neptune)
सौर मंडल बौने ग्रह (Dwarf Planets): 5 (Ceres, Pluto, Eris, Haumea, Makemake)
सौर मंडल चंद्रमा (Moons): 575+
सौर मंडल उल्कापिंड (Asteroids): 796,354 (सिंतबर 2019 तक)
सौर मंडल धूमकेतू (Comets): 4,143 (सिंतबर 2019 तक)
सौर मंडल की सीमा (Diameter): 187. 5 खरब किलोमीटर

9 ग्रह – सौर मंडल में नौ ग्रह हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं  सूर्य (sun), बुध (Mercury), शुक्र (Venus), पृथ्वी (Earth), मंगल (Mars), बृहस्पति (Jupiter), शनि (Saturn), अरुण(Uranus), नेप्टून (Neptune) ।

5 बौने ग्रह – Pluto, Ceres, Haumea, Makemake, and Eris.

कुल चंद्रमा : 575+
कुल उल्कापिंड : 7,96,354 
कुल धूमकेतू (Comets) : 4,143 धूमकेतू (Comets)

ग्रहों को मुख्यतः दो समूहों को में बांटा गया है –
  1. Terrestrial Planets (स्थलीय ग्रह)
  2. Giant Planets (विशाल ग्रह)
टेरेस्ट्रियल ग्रह (स्थलीय ग्रह):
  1. इन्हें आंतरिक ग्रह भी कहा जाता है। 
  2. इनका साइज़ छोटा होता है। 
  3. इनकी composition (संरचना) पथरीली है। 
  4. Mercury, Venus, Earth, एंड Mars। 
जायंट ग्रह (विशाल ग्रह (गैसीय ग्रह):
  1. इन्हें बाहरी ग्रह भी कहा जाता है।
  2. इनका आकार टेरेस्ट्रियल के मुकाबले काफी बड़ा होता है।
  3. ये पूरे gas से भरे होते हैं. (मतलब लाइफ असंभव)।
  4. Jupiter, Saturn, Uranus, and Neptune।

  1. सूर्य (sun) : सूर्य हमारे सौरमंडल का आधार है। सूर्य सौरमंडल के केन्द्र में स्थित एक बहुत बड़ा तारा है जिसके चारों तरफ पृथ्वी और सौरमंडल के अन्य ग्रह अपने अक्ष और अपनी सीमा रेखा के अंदर चक्र लगाते हैं। सूर्य हमारे सौर मंडल का सबसे बड़ा पिंड ग्रह है। और उसका व्यास लगभग 13 लाख 90 हज़ार किलोमीटर है।  जो पृथ्वी से लगभग109 गुना अधिक बड़ा है। सूर्य हाइड्रोजन और हीलियम गैसों का एक विशाल गोला है। परमाणु विलय की प्रक्रिया की मदद से सूर्य अपने केंद्र में ऊर्जा पैदा करता है। सूर्य से निकली हुई ऊर्जा, सूर्य के प्रकाश का छोटा सा भाग ही पृथ्वी पर पहुँचता है क्यूंकि उसमे से 15 प्रतिशत अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाता है,30 प्रतिशत पानी को भाप बनाने में काम आता है और बहुत सी ऊर्जा पेड़-पौधे, समुद्र, मनुष्य, जीव जंतु सोख लेते हैं। इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारन ही विभिन्न कक्षाओं में घूमते हुए पृथ्वी और अन्य ग्रहों को इसकी तरफ बंधे रहते है। सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग 14,96,00,000 किलोमीटर और 9,29,60,000 मील है तथा सूर्य से पृथ्वी पर प्रकाश को आने में 8.3 मिनट का समय लगता है। इसी प्रकाशीय ऊर्जा से प्रकाश-संश्लेषण नामक एक महत्वपूर्ण जैव-रासायनिक अभिक्रिया होती है जो पृथ्वी पर जीवन का आधार है। यह पृथ्वी के जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है। सूर्य की सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हिलियम, लोहा, निकेल, ऑक्सीजन, सिलिकन, सल्फर, मैग्निसियम, कार्बन, नियोन, कैल्सियम, क्रोमियम तत्वों से हुआ है। इनमें से हाइड्रोजन सूर्य के सतह की मात्रा का 74 % तथा हिलियम 24% है।
  2. बुध (Mercury) : सूर्य के सबसे पास का ग्रह बुध है जो द्रव्यमान में आठवीं गिनती पर आता है। बुध व्यास (Diameter)  से गीनीमेड और टाईटन चण्द्रमाओ से छोटा है लेकिन द्रव्यमान(Mass) मे दूगना है। ये सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह भी है, हालांकि सूर्य के सबसे नजदीक होने के बाद भी ये सौर मंडल का सबसे गर्म ग्रह नहीं है। यह सूर्य की एक परिक्रमा करने में 88 दिन लगाता है। यह लोहे और जस्ते का बना हुआ हैं। अभी तक दो अंतरिक्ष यान  मैरीनर-10 तथा मैसेन्जर बुध ग्रह जा चूके है। मैरीनर-10 सन 1974 तथा 1975 के मध्य तीन बार इस ग्रह की यात्रा कर चूका है। बुध ग्रह सौर मंडल में सूर्य के सबसे निकट स्थित और आकार में सबसे छोटा ग्रह है। यम (प्लूटो) को पहले सबसे छोटा ग्रह माना जाता था पर अब इसका वर्गीकरण बौना ग्रह के रूप में किया जाता है। यह सूर्य की एक परिक्रमा करने में 88 दिन लगाता है। यह लोहे और जस्ते का बना हुआ हैं। यह अपने परिक्रमा पथ पर 29 मील प्रति क्षण की गति से चक्कार लगाता हैं। बुध सूर्य के सबसे पास का ग्रह है और द्रव्यमान से आंठवे क्रमांक पर है। बुध व्यास से गैनिमीड और टाईटन चण्द्रमाओ से छोटा है लेकिन द्रव्यमान में दूगना है। इसका एक भी उपग्रह नही हैं। कक्षा : 57,910,000 किमी (0.38 AU) सूर्य से,  व्यास : 4880 किमी,  द्रव्यमान :3.30e23 किग्रा . बुध की कक्षा काफी ज्यादा विकेन्द्रीत(eccentric) है, इसकी सूर्य से दूरी 46,000,000 किमी(perihelion ) से 70,000,000 किमी(aphelion) तक रहती है। जब बुध सूर्य के नजदिक होता है तब उसकी गति काफी धिमी होती है। इसकी की सतह पर तापमान 90 डीग्री केल्वीन (1 Degree Celsius = 274.15 Kelvin) से 700 डीग्री केल्वीन तक जाता है। शुक्र पर तापमान इससे गर्म है लेकिन स्थायी है। बुध की सतह पर चन्द्रमा के जैसे क्रेटर (गडढे) है। इसकी सतह स्थायी है, उस पर परतो मे कोई गतिविधी नही है। इसका घनत्व 5.43 ग्राम/सेमी है और यह पृथ्वी के बाद सबसे ज्यादा घनत्व वाला पिंड है। ग्रहपथ :  57,910,000 किमी (0.38 AU) सूर्य से व्यास : 48080 किमी द्रव्यमान : 3.30e23 किग्रा यहां दिन अति गर्म हो राते बर्फीली होती है इसका तापांतर सभी ग्रहों में सबसे अधिक 600 डिग्री सेल्सियस है इसका तापमान रात में -173 डिग्री है वह दिन में 427 डिग्री हो जाता है।
  3. शुक्र (Venus) : शुक्र (Venus)  ग्रह हमारे सौर-मंडल का एक ग्रह है जो सूर्य से निकटतम दूरी के क्रम में दूसरे स्थान पर आता है, पहले नंबर पर बुध ग्रह है। और दूसरे नंबर पर शुक्र (Venus) ग्रह। शुक्र लगभग आकार में हमारे ग्रह पृथ्वी जैसा ही है। रात में आकाश में चंद्रमा के बाद जो सबसे ज्यादा चमकने वाला आकाशिये पिंड है तो वह शुक्र ग्रह ही है। इसका परिक्रमा पथ 108,200,000 किलोमीटर लम्बा है। इसका व्यास 12,103 किलोमीटर है। शुक्र सौर मंडल  का सबसे गरम ग्रह है। कक्षा :0.72 AU या 108,200,000 किमी ( सूर्य से), व्यास : 12,103.6 किमी, द्रव्यमान : 4.869e24 किग्रा। शुक्र का घुर्णन (Rotation) विचित्र है, यह काफी धीमा है। इसका एक दिन 243 पृथ्वी के दिन के बराबर है जो कि शुक्र के एक वर्ष से कुछ ज्यादा है। शुक्र का घुर्णन और उसकी कक्षा कुछ इस तरह है कि शुक्र की केवल एक ही सतह पृथ्वी से दिखायी देती है। सूर्य और चंद्रमा के बाद, शुक्र (Venus) आसमान में सबसे प्रतिभाशाली ग्रह है। शुक्र हमारे सौर मंडल में दक्षिण दिशा में घूर्णन करता है इसकी बहुत धीमी गती और रोटेशन के कारण, विशेषज्ञों का मानना है कि अतीत में यह ग्रह किसी से  टकराया होगा जिससे इसकी रोटेशन गति बदल गई है। शुक्र सूर्य से दूसरा ग्रह है और छठंवा सबसे बड़ा ग्रह है। इसका परिक्रमा पथ 108¸200¸000 किलोमीटर लम्बा है। इसका व्यास 12¸103.6 किलोमीटर है। ग्रहपथ :0.72 AU या 108,200,000 किमी (सूर्य से)। शुक्र की ग्रहपथ लगभग पूर्ण वृत्त है। व्यास : 12,103.6 किमी द्रव्यमान : 4.869e24 किग्रा है। यह विपरीत दिशा में घूमता रहता है।
  4. पृथ्वी (Earth) : सूर्य से दूरी में तीसरे स्थान पर पृथ्वी ग्रह आता है। पृथ्वी में ज्यादा जल होने के कारण यह अंतरिक्ष से नील रंग का दिखाई देता है इसलिए इसे नीला ग्रह भी कहते है। ये एकमात्र ग्रह हैं जहां पर जीवन है। पृथ्वी ग्रह अकेला ऐसा ग्रह है जिस पर सभी प्रकार के जीवो के लिए जीवन उपलब्ध है। इसकी सूर्य से जो दूरी है वह एक इकाई मानी जाती है जिस खगौलीय एकाई या AU (Astronomical Unit) कहते हैं। 1 AU का मतलब है 15 करोड़ किलोमीटर। कक्षा 1.00: 149,600,000 किमी ( AU , सूर्य से), व्यास : 12,756.3 किमी, द्रव्यमान : 5.972e24 किग्रा। पृथ्वी की आयु  4.5 अरब वर्ष से लेकर 4.6 अरब वर्ष है लेकिन पृथ्वी की सबसे पूरानी चट्टान 4 अरब वर्ष पूरानी है, 3 अरब वर्ष से पूराने चट्टाने दूर्लभ है। जीवित प्राणियो के जीवाश्म की आयु 3.9 अरब वर्ष से कम है। जीवन के प्रारंभ के समय के कोई प्रमाण उपलब्ध नही है। पृथ्वी की सतह का 70% हिस्सा पानी से ढंका है। पृथ्वी अकेला ग्रह है जिस पर पानी द्रव अवस्था मे सतह पर उपलब्ध है। पृथ्वी के वातावरण मे 78% नाइट्रोजन, 21% आक्सीजन,और कुछ मात्रा मे आर्गन,कार्बन डाय आक्साईड और जल वाष्प है। पृथ्वी की एक ही प्राकृतिक उपग्रह है: चन्द्रमा। इसके अलावा हजारो की संख्या मे क्रत्रिम उपग्रह है। क्षुद्रग्रह 3753 क्रुथेन और 2002ए, ए29 पृथ्वी के साथी है। जो पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते है। पृथ्वी बुध और शुक्र के बाद सुर्य से तीसरा ग्रह है। सुर्य से पृथ्वी की औसत दूरी को खगोलीय इकाई कहते हैं। ये लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है। ये दूरी वासयोग्य क्षेत्र में है। किसी भी सितारे के गिर्द ये एक ख़ास ज़ोन होता है, जिस में ज़मीन की सतह के उपर का पानी तरल अवस्था में रहता है। इसका व्यास 12756 km है तथा इसके धुविए व्यास 12743 km है। 
  5. मंगल (Mars) : मंगल  सौरमंडल में सूर्य से चौथा ग्रह है। पृथ्वी से देखने पर ये ग्रह एकदम लाल दिखाई पड़ता है। इस ग्रह की सतह जो कि चट्टानों और रेत के कणों से बनी है। सौरमंडल में ग्रह दो तरह के होते हैं – “स्थलीय ग्रह (Surface Planet) ” जिनमें ज़मीन होती है और “गैसीय ग्रह (Gaseous Planet) ” जिनमें अधिकतर गैस ही गैस है। पृथ्वी की तरह, मंगल भी एक स्थलीय धरातल वाला ग्रह है। कक्षा :1.52: 227,940,000 किमी ( ए.यू. सूर्य से), व्यास : 6794 किमी, द्रव्यमान : 6.4219e23 किलो। मंगल पर 1965 मे मैरीनर – 4 यान भेजा गया था। उसके बाद इस ग्रह पर मार्स 2 जो मंगल पर उतरा भी था,के अलावा बहुत सारे यान भेजे गये है। 1976 मे दो वाइकिंग यान भी मंगल पर उतरे थे। इसके 20 वर्ष पश्चात 4 जुलाई 1997 को मार्श पाथफाईंडर मंगल पर उतरा था। भारत का मंगलयान भी अब मंगल की कक्षा में स्थापित होकर इसका अध्ययन कर रहा है। मंगल पर औसत तापमान 218 डिग्री केल्वीन(-55 डिग्री सेल्सीयस) है। मंगल की सतह का तापमान 133 डिग्री सेल्सीयस से 27 डिग्री सेल्सीयस तक बदलता है। कक्षा :1.52: 227,940,000 किमी ( ए.यू. सूर्य से), व्यास : 6794 किमी, द्रव्यमान : 6.4219e23 किलो।  मंगल पर 1965 मे मैरीनर – 4 यान भेजा गया था। उसके बाद इस ग्रह पर मार्स 2 जो मंगल पर उतरा भी था,के अलावा बहुत सारे यान भेजे गये है। 1976 मे दो वाइकिंग यान भी मंगल पर उतरे थे। इसके 20 वर्ष पश्चात 4 जुलाई 1997 को मार्श पाथफाईंडर मंगल पर उतरा था। भारत का मंगलयान भी अब मंगल की कक्षा में स्थापित होकर इसका अध्ययन कर रहा है। मंगल पर औसत तापमान 218 डिग्री केल्वीन(-55 डिग्री सेल्सीयस) है। मंगल की सतह का तापमान 133 डिग्री सेल्सीयस से 27 डिग्री सेल्सीयस तक बदलता है। पृथ्वी से यह ग्रह साफ दिखाई देता है लाल रंग में , इसे "लाल ग्रह" के नाम से भी जाना जाता है। इसका वातावरण विरल है। इसकी सतह देखने पर चंद्रमा के गर्त और पृथ्वी के ज्वालामुखियों, घाटियों, रेगिस्तान और ध्रुवीय बर्फीली चोटियों की याद दिलाती है। हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊँचा पर्वत, ओलम्पस मोन्स मंगल पर ही स्थित है। साथ ही विशालतम कैन्यन वैलेस मैरीनेरिस भी यहीं पर स्थित है। अपनी भौगोलिक विशेषताओं के अलावा, मंगल का घूर्णन काल और मौसमी चक्र पृथ्वी के समान हैं। 1966 में मेरिनर-4 के द्वारा की पहली मंगल उडान से पहले तक यह माना जाता था कि ग्रह की सतह पर तरल अवस्था में जल हो सकता है। यह हल्के और गहरे रंग के धब्बों की आवर्तिक सूचनाओं पर आधारित था विशेष तौर पर, ध्रुवीय अक्षांशों, जो लंबे होने पर समुद्र और महाद्वीपों की तरह दिखते हैं, काले striations की व्याख्या कुछ प्रेक्षकों द्वारा पानी की सिंचाई नहरों के रूप में की गयी है। इन सीधी रेखाओं की मौजूदगी बाद में सिद्ध नहीं हो पायी और ये माना गया कि ये रेखायें मात्र प्रकाशीय भ्रम के अलावा कुछ और नहीं हैं। फिर भी, सौर मंडल के सभी ग्रहों में हमारी पृथ्वी के अलावा, मंगल ग्रह पर जीवन और पानी होने की संभावना सबसे अधिक मानी जाती है।
  6. बृहस्पति (Jupiter) : बृहस्पति सूर्य से पांचवा और सबसे बड़ा ग्रह है। यह महाकाय ग्रह बाकी सभी ग्रहो के कुल द्रव्यमान का दूगुना है। बृहस्पति का द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 318 गुणा है। इसकी विशालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसका आकार हमारी धरती से 1300 गुना बड़ा है। इस ग्रह को सबसे विशाल गैसों वाला ग्रह भी कहते हैं। यह गैस से बना एक ग्रह है जिसकी सतह के बारे में वैज्ञानिक कुछ नहीं जानते हैं। इसके वातावरण में गैसों के अलाबा कुछ नहीं है।कक्षा : 778,330,000 किमी (5.20 AU) सूर्य से, व्यास : 142,948 किमी(भूमध्य रेखा पर), द्रव्यमान : 1.900e27 किग्रा। बृहस्पति हिन्दू मिथको के अनुसार देवताओ के गुरू है। जूपिटर रोमन मिथको के अनुसार क्रोनस(शनि) के बेटे और देवताओ के राजा, ओलम्पस के सम्राट तथा रोमन साम्राज्य के रक्षक है। ग्रीक मिथको मे वे जीयस है। 1610 मे गैलीलीयो ने पहली बार इसे दूरबीन से देखा था और इसके चार सबसे बड़े चन्द्रमा आयो,युरोपा, गनीमीड और कैलीस्टो की खोज की थी। बृहस्पति पर पिछले 350 सालों से एक बवंडर चल रहा है जो कि लाल बादलों से बना हुआ है। यह बवंडर इतना बड़ा है कि इसमें तीन पृथ्वीयां समा सकती हैं। चित्रों में देखने पर यह एक धब्बे की तरह नज़र आता है और इसे बृहस्पति की लाल आँख भी कहते हैं। बृहस्पति सूर्य सेे पांचवाँ और हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। यह एक गैस दानव है जिसका द्रव्यमान सूर्य के हजारवें भाग के बराबर तथा सौरमंडल में मौजूद अन्य सात ग्रहों के कुल द्रव्यमान का ढाई गुना है। बृहस्पति को शनि, युरेनस और नेप्चून के साथ एक गैसीय ग्रह के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इन चारों ग्रहों को बाहरी ग्रहों के रूप में जाना जाता है। यह ग्रह प्राचीन काल से ही खगोलविदों द्वारा जाना जाता रहा है तथा यह कई संस्कृतियों की पौराणिक कथाओं और धार्मिक विश्वासों के साथ जुड़ा हुआ था। रोमन सभ्यता ने अपने देवता जुपिटर के नाम पर इसका नाम रखा था। जब इसे पृथ्वी से देखा गया, तो यह चन्द्रमा और शुक्र के बाद तीसरा सबसे अधिक चमकदार निकाय बन गया (मंगल ग्रह अपनी ग्रहपथ (धुरी) के कुछ बिंदुओं पर बृहस्पति की चमक से मेल खाता है)।बृहस्पति को देवताओं का ग्रह कहा जाता है।
  7. शनि (Saturn) : शनि को कभी-कभी “सौर मंडल का गहना” कहा जाता है। यह सूर्य से छठा ग्रह है और बृहस्पति के बाद सबसे बड़ा ग्रह है। यह एक ग्रह है, मनुष्य एक लंबे समय से शनि ग्रह को देखता आ रहा है, इसके छल्ले और इसका आकार हजारों वर्षों से मानवों को आकर्षित करता रहा है। कक्षा : 1,429,400,00 किमी (9.54 AU) सूर्य से, व्यास: 120,536किमी (विषुवत वृत्त पर), द्रव्यमान: 5.68e26 किग्रा। गैलीलीयो ने इसे दूरबीन से पहली बार 1610 मे देखा था। उन्होने शनि के विचित्र आकार को देखा था और मजाक मे कहा था कि  शायद शनि के दो कान भी है। हम  इसके छल्लों को हम अपनी आँखो से आसानी से देख सकते हैं, इसके लिए आपको बस एक छोटी सी दूरबीन चाहिए। पायोनियर 11 ने 1979 मे पहली बार शनि की यात्रा की थी, उसके पश्चात वायेजर 1 , वायेजर 2 ने शनि की यात्रा की थी। Cassini अभियान जुलाई 2004 मे शनि के पास पहुंचा था और चार वर्ष शनि की कक्षा मे रहा है। शनि का घनत्व अन्य ग्रहो से कम है, यह पानी के घनत्व का 0.7 भाग है। शनि का घनत्व पृथ्वी के घनत्व का 1/8 भाग है जबकि शनि का व्यास पृथ्वी से 9 गुणा है। आप शनि पर नहीं खड़े हो सकते हैं यह पृथ्वी की तरह नहीं है शनि ज्यादातर गैसों से बना है इसमें बहुत हीलियम है यह वही गैस है जो आप गुब्बारे में डालते हैं। शनि सौरमण्डल का एक सदस्य ग्रह है। यह सूरज से छठे स्थान पर है और सौरमंडल में बृहस्पति के बाद सबसे बड़ा ग्रह हैं। इसके कक्षीय परिभ्रमण का पथ 14,29,40,000 किलोमीटर है। शनि के 81 उपग्रह हैं। जिसमें टाइटन सबसे बड़ा है। टाइटन बृहस्पति के उपग्रह गिनिमेड के बाद दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह है। शनि ग्रह की खोज प्राचीन काल में ही हो गई थी। गैलीलियो गैलिली ने सन् 1610 में दूरबीन की सहायता से इस ग्रह को खोजा था। शनि ग्रह की रचना 75% हाइड्रोजन और 25% हीलियम से हुई है। जल, मिथेन, अमोनिया और पत्थर यहाँ बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं। हमारे सौर मण्डल में चार ग्रहों को गैस दानव कहा जाता है, क्योंकि इनमें मिटटी-पत्थर की बजाय अधिकतर गैस है और इनका आकार बहुत ही विशाल है। शनि इनमे से एक है - बाकी तीन बृहस्पति, अरुण (युरेनस) और वरुण (नेप्च्यून) हैं।
  8. अरुण (Uranus) : युरेनस सूर्य का सांतवा तथा तीसरा सबसे बड़ा (व्यास से) ग्रह है। युरेनस नेपच्युन से आकार मे बड़ा लेकिन द्रव्यमान से छोटा है। व्यास के आधार पर यह सौर मण्डल का तीसरा बड़ा और द्रव्यमान के आधार पर चौथा बड़ा ग्रह है। द्रव्यमान में यह पृथ्वी से 14.5 गुना अधिक भारी और अकार में पृथ्वी से 63 गुना अधिक बड़ा है। कक्षा : 2,870,990,000 किमी(19.218 AU)सूर्य से, व्यास :51,118किमी (विषुवत वृत्त (Equator)पर), द्रव्यमान : 8.683e25 किग्रा। युरेनस आधिनिक काल मे खोजा जाने वाला पहला ग्रह है जिसे विलियम हर्शेल ने 13 मार्च 1781 को अपनी दूरबीन से खोजा था। इसे इसके पहले भी देखा गया था लेकिन उसे तारा समझ कर उपेक्षित किया गया। वायेजर 2 ने 24 जनवरी 1986 को युरेनस की यात्रा की थी। ये मुख्यतः चट्टान और विभिन्न तरह की बर्फ से बना है जिसमे 15% हायड्रोजन और थोड़ी हीलीयम है। यह बृहस्पति और शनि के विपरित है जो मुख्यतः हायड़्रोजन से बने है। इसके वातावरण मे 83% हायड्रोजन, 15% हीलीयम और 2% मिथेन है। अन्य गैस महाकाय ग्रहो की तरह युरेनस पर बादलो के पट्टे है जो तेज गति से बहते है। इस ग्रह का नीला रंग उसके वातावरण मे उपरी भाग मे स्थित मिथेन द्वारा लाल रंग के अवशोषण के कारण है। बृहस्पति के जैसे विभिन्न रंगो के पट्टे मौजूद हो सकते है लेकिन वे उपरी वातावरण मे मौजूद मिथेन द्वारा ढंके हुये है। अरुण या युरेनस हमारे सौर मण्डल में सूर्य से सातवाँ ग्रह है। व्यास के आधार पर यह सौर मण्डल का तीसरा बड़ा और द्रव्यमान के आधार पर चौथा बड़ा ग्रह है। द्रव्यमान में यह पृथ्वी से 14.5 गुना अधिक भारी और अकार में पृथ्वी से 63 गुना अधिक बड़ा है। औसत रूप से देखा जाए तो पृथ्वी से बहुत कम घना है - क्योंकि पृथ्वी पर पत्थर और अन्य भारी पदार्थ अधिक प्रतिशत में हैं जबकि अरुण पर गैस अधिक है। इसीलिए पृथ्वी से तिरेसठ गुना बड़ा अकार रखने के बाद भी यह पृथ्वी से केवल साढ़े चौदह गुना भारी है। हालांकि अरुण को बिना दूरबीन के आँख से भी देखा जा सकता है, यह इतना दूर है और इतनी माध्यम रोशनी का प्रतीत होता है की प्राचीन विद्वानों ने कभी भी इसे ग्रह का दर्जा नहीं दिया और इसे एक दूर टिमटिमाता तारा ही समझा। 13 मार्च 1781 में विलियम हरशल ने इसकी खोज की घोषणा करी। अरुण दूरबीन द्वारा पाए जाने वाला पहला ग्रह था। इसके 15 उपग्रहों में से 10 की खोज 1986 में वायेजर=1 यान द्वारा हुई है।
  9. वरुण (Neptune –नेपच्युन ) : नेपच्युन सूर्य का आंठवा और चौथा सबसे बड़ा(व्यास से) ग्रह है। नेपच्युन युरेनस से व्यास के आधार पर छोटा लेकिन द्रव्यमान के आधार पर बड़ा ग्रह है। इसका द्रव्यमान पृथ्वी से 17 गुना अधिक है और अपने पड़ौसी ग्रह अरुण (युरेनस) से थोड़ा अधिक है। नेपच्यून को पहली बार 1846 में खोजा गया था । इस ग्रह को Jean Joseph Le Verrier ने खोजा था । यह अन्य सभी ग्रहों की तुलना में बाद में पता चला था क्योंकि यह नग्न आंखों के लिए नहीं दिखाई देता है। कक्षा : 4,504,000,000 किमी(30.06 AU) सूर्य से, व्यास : 49,532 किमी(विषुवत पर), द्रव्यमान :1.0247e26 किग्रा। नेपच्युन की यात्रा केवल एक ही अंतरिक्ष यान वायेजर 2 ने की है। नेपच्युन के बारे मे अधिकतर जानकारी इस यान द्वारा दी गयी है लेकिन हब्बल और अन्य वेधशालाओ ने भी इस ग्रह के बारे मे जानकारी जुटायी है। इस ग्रह  की संरचना युरेनस के जैसी है। यह मुख्यतः चट्टान और विभिन्न तरह की बर्फ से बना है जिसमे 15% हायड्रोजन और थोड़ी हीलीयम है। यह बृहस्पति और शनि के विपरित है जो मुख्यतः हायड़्रोजन से बने है। युरेनस और नेपच्युन मे बृहस्पति और शनि के विपरित परतदार आंतरिक संरचना नही है और उसमे पदार्थ समान रूप से वितरित है। इनके केन्द्र मे पृथ्वी के आकार का चट्टानी केन्द्रक है। इसके वातावरण मे 83% हायड्रोजन, 15% हीलीयम और 2% मिथेन है। नेपच्युन का निला रंग उसके वातावरण मे उपरी भाग मे स्थित मिथेन द्वारा लाल रंग के अवशोषण के कारण है लेकिन किसी अन्य अज्ञात तत्व की मौजूदगी से इसके बादलो को गहरा निला रंग मीला है। वरुण, नॅप्टयून या नॅप्चयून हमारे सौर मण्डल में सूर्य से आठवाँ ग्रह है। व्यास के आधार पर यह सौर मण्डल का चौथा बड़ा और द्रव्यमान के आधार पर तीसरा बड़ा ग्रह है। वरुण का द्रव्यमान पृथ्वी से 17 गुना अधिक है और अपने पड़ौसी ग्रह अरुण (युरेनस) से थोड़ा अधिक है। खगोलीय इकाई के हिसाब से वरुण की ग्रहपथ सूरज से 30.1 ख॰ई॰ की औसत दूरी पर है, यानि वरुण पृथ्वी के मुक़ाबले में सूरज से लगभग तीस गुना अधिक दूर है। वरुण को सूरज की एक पूरी परिक्रमा करने में 164.79 वर्ष लगते हैं, यानि एक वरुण वर्ष 164.79 पृथ्वी वर्षों के बराबर है।


Tuesday, September 14, 2021

जानिए ब्रह्माण्ड (सौरमंडल) के बारे में सम्पूर्ण जानकारी और ब्रह्माण्ड में कितनी गैलक्सी है। Know complete information about the universe (solar system) and how many galaxies are there in the universe.

ब्रह्माण्ड केवल गैलक्सी का ही समूह नहीं है। उसमें सम्पूर्ण अंतरिक्ष और उनकी अंतर्वस्तु, ब्रह्माण्ड के सभी ग्रह, तारे, गैलेक्सियाँ, खगोलीय पिण्ड, समय ,विभिन्न प्रकार की गैसे, उल्का पिण्ड,छोटे-बड़े सभी प्रकार के तारे, ग्रह, गैलेक्सियों के बीच के अंतरिक्ष की अंतर्वस्तु, अपरमाणविक कण, धूल और हर प्रकार के पदार्थ और सारी ऊर्जा सम्मिलित है। अभी तक वैज्ञानिक केवल इतना अनुमान लगा पाए है की ब्रह्माण्ड का व्यास वर्तमान में लगभग 28 अरब पारसैक यानि की (91.1 अरब प्रकाश-वर्ष) है। पूरे ब्रह्माण्ड का व्यास अज्ञात है, और हो सकता है कि यह अनन्त हो।

ब्रह्माण्ड में सौ अरब गैलेक्सी अस्तित्व में है। जो बड़ी मात्रा में तारे, गैस और खगोलीय धूल को समेटे हुए है। गैलेक्सियों ने अपना जीवन लाखो वर्ष पूर्व प्रारम्भ किया और धीरे धीरे अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त किया। प्रत्येक गैलेक्सियाँ अरबों तारों को समेटे हुए है। गुरुत्वाकर्षण तारों को एक साथ बाँध कर रखता है और इसी तरह अनेक गैलेक्सी एक साथ मिलकर तारा गुच्छ में रहती है।

प्रारंभ में खगोलशास्त्रियों की धारणा थी कि ब्रह्मांड में नई गैलेक्सियों और क्वासरों का जन्म संभवत: पुरानी गैलेक्सियों के विस्फोट के फलस्वरूप होता है। लेकिन यार्क विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्रियों-डॉ॰सी.आर. प्यूटर्न और डॉ॰ए.ई राइट ने गैलेक्सियों के चार समूहों की अंतरक्रियाओं का अध्ययन करके इस धारणा का खंडन किया है। उन्होंने यह बताया कि गैलेक्सियों के बीच में ऐसी विस्फोटक अंतर क्रियाएँ नहीं होती हैं जो नई गैलेक्सियों को जन्म दे सकें।

गैलेक्सी के प्रकार

अधिकाँश गैलेक्सियों का केंद्र तारों से भरा हुआ गोलाकार भाग होता है, जिसे नाभिक कहा जाता है और यह नाभिक अपने चारों ओर एक तलीय गोलाकार डिस्क से जुडा होता है। खगोलविज्ञानी गैलेक्सियों को उनके आकार के आधार पर मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित करते हैं- सर्पिल गैलेक्सी, दीर्घवृत्तीय गैलेक्सी तथा अनियमितत गैलक्सी। 'सर्पिल गैलेक्सी' डिस्क के आकार की होती है, जिसके बीच का भाग उभरा होता है। इस केन्द्रीय उभार से चमकीले सर्पिल निकले होते हैं। इस गैलेक्सी में स्थित तारे अपेक्षाकृत कम आयु के होते हैं। हमारी आकाशगंगा "मिल्की वे" इसी के अंतर्गत आती है। 'दीर्घवृत्तीय गैलेक्सी' चक्राकार या ग्लोबाकार होती है। इन गैलेक्सियों का केन्द्र सर्वाधिक चमकीला होता है और परीधि की तरफ चमक कम होता जाता है। इस गैलेक्सी में स्थित तारे अपेक्षाकृत अधिक आयु के होते हैं। 'अनियमित गैलेक्सी' का कोई निश्चित आकार नहीं होता है। इनका आकार परिवर्तित होता रहता है। कम गुरुत्व शक्ति के कारण इनमें ऐसा होता है। यह कोई नहीं जानता कि क्यों गैलेक्सियाँ एक निश्चित रूप धारण करती है। शायद यह गैलेक्सियों के घूर्णन के वेग, गुरुत्व शक्ति और उसमें स्थित तारों के बनने कि गति पर निर्भर करता है।

हमारी गैलेक्सी

हमारी गैलेक्सी (जिसमें हमारी पृथ्वी है) की चौड़ाई और चमक सर्वत्रसमान नहीं है। धनु (सैजिटेरियस) तारामंडल में यह सबसे अधिक चौड़ी और चमकीली है। दूरदर्शी से देखने पर गैलेक्सी में असंख्य तारे दिखाई पड़ते हैं। विभिन्न चमक के तारों की संख्या गिनकर, उनकी दूरी की गणना कर और उनकी गति नापकर ज्योतिषियों ने गैलेक्सी के वास्तविक रूप का बहुत अच्छा अनुमान लगा लिया है। यदि आकाश में दिखाई पड़नेवाले रूप के बदले त्रिविमतीय अवकाश (स्पेस) में गैलेक्सी के रूप पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि गैलेक्सी लगभग समतल वृत्ताकार पहिए के समान है जिसकी धुरी के पास का भाग कुछ फूला हुआ है। चित्र में गैलेक्सी का बगल से चित्र दिखाया गया है (ऊपर से देखने पर गैलेक्सी पूर्ण वृत्ताकार दिखाई पड़ेगी)। इस पहिए का व्यास लगभग एक लाख प्रकाशवर्ष है (1 प्रकाशवर्ष = (5.9´1012) मील या पृथ्वी से सूर्य की दूरी का 63 हजार गुना) और मोटाई 3,000से 6,000प्रकाशवर्ष के बीच है। केंद्र के पास की मोटाई लगभग 15,000 प्रकाशवर्ष है। हमारी गैलेक्सी में तारे समान रूप से वितरित नहीं हैं। बीच बीच में अनेक तारागुच्छ हैं और इसकी भी संभावना है कि देवयानी (ऐंड्रोमीडा) नीहारिका के समान हमारी गैलेक्सी में भी सर्पिल कुंडलियाँ (स्पाइरल आर्म्स) हों। तारों के बीच में सूक्ष्म धूलि और गैस फैली हैं, जो दूर के तारों का प्रकाश क्षीण कर देती हैं। धूलि और गैस का घनत्व संस्था के मध्यतल में अधिक है। कहीं कहीं धूलि के घने बादल हो जाने से काली नीहारिकाएँ बन गई हैं। कहीं गैस के बादल पास के तारों के प्रकाश से उद्दीप्त होकर चमकती नीहारिका के रूप में दिखाई पड़ते हैं। हमारी गैलेक्सी का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग एक खरब (1011) गुना है। इसमें से प्राय: आधा तो तारों का द्रव्यमान है और आधा धूलि और गैस का।


गैलेक्सी का वातावरण

हमारी गैलेक्सी बीच में फूली हुई वृत्ताकार पूड़ी के समान है। इसमें एक वृत्त के भीतर ही वे सब तारे हैं जो हमें आकाश में पृथक्‌-पृथक्‌ दिखाई पड़ते हैं। हमारी गैलेक्सी के चारों ओर बहुत दूर तक तारे और तारागुच्छ विरलता से फैले हुए हैं।

हमारी गैलेक्सी के केंद्र के पास तारे संख्या में अधिक घने हैं और किनारे की ओर अपेक्षाकृत बिखरे हुए हैं। सभी तारे केंद्र की परिक्रमा कर रहे हैं, केंद्र के निकटवाले तारे अधिक गति से और दूरवाले कम गति से। हमारा सूर्य केंद्र से लगभग ३०-३५ हजार प्रकाशवर्ष दूर है और गैलेक्सी के मध्य तल में हैं। इसी कारण अपनी गैलेक्सी हमें वैसी मेखला की तरह दिखाई पडुती हैं जिसका ऊपर वर्णन किया गया है। पृथ्वी से गैलेक्सी का केंद्र धनु तारामंडल की ओर है। इसीलिए गैलेक्सी के केंद्र की परिक्रमा करता है। इस परिक्रमा में उसका वेग 150 मील प्रति सेंकड हैं। इस वेग से भी पूरी परिक्रमा में सूर्य को 20 करोड़ वर्ष लग जाते हैं।

कुछ तीव्र गतिवाले तारे और गोलीय तारगुच्छ (ग्लोब्यूलर क्लस्टर) हमारी गैलेक्सी की सीमा के बाहर हैं, किंतु ये भी हमारी गैलेक्सी से संबद्ध हैं और उसी के अंग माने जाते हैं (द्र. चित्र) लगभग 100 गोलीय तारागुच्छ ज्ञात हैं। इनका वितरण गोलाकार है। इन तारागुच्छों के वितरण से गैलेक्सी का केंद्र ज्ञात किया जा सकता है। तारों की गति नापने से भी केंद्र की गणना में सहायता मिलती है। रूप और विस्तार में गैलेक्सी बहुत सी अगांग (एक्स्ट्रा गैलक्टिक) नीहारिकाओं से (अर्थात उन गैलेक्सियों से जो हमारी गैलेक्सी से पूर्णतया बाहर हैं) मिलती जुलती हैं।

मन्दाकिनी या गैलेक्सी, असंख्य तारों का समूह है जो स्वच्छ और अँधेरी रात में, आकाश के बीच से जाते हुए अर्धचक्र के रूप में और झिलमिलाती सी मेखला के समान दिखाई पड़ता है। यह मेखला वस्तुत: एक पूर्ण चक्र का अंग हैं जिसका क्षितिज के नीचे का भाग नहीं दिखाई पड़ता। भारत में इसे मंदाकिनी, स्वर्णगंगा, स्वर्नदी, सुरनदी, आकाशनदी, देवनदी, नागवीथी, हरिताली आदि भी कहते हैं।

हमारी पृथ्वी और सूर्य जिस गैलेक्सी में अवस्थित हैं, रात्रि में हम नंगी आँख से उसी गैलेक्सी के ताराओं को देख पाते हैं। अब तक ब्रह्मांड के जितने भाग का पता चला है उसमें लगभग ऐसी ही 19 अरब गैलेक्सीएँ होने का अनुमान है। ब्रह्मांड के विस्फोट सिद्धांत (बिग बंग थ्योरी ऑफ युनिवर्स) के अनुसार सभी गैलेक्सीएँ एक दूसरे से बड़ी तेजी से दूर हटती जा रही हैं।

हमे उम्मीद है हमारे द्वारा दी गई जानकारी आपके ज्ञान को बढ़ाए गी। अगर आपको इसलेख से सही जानकारी मिली हो तो आप हमे कमेंट करके जरूर बताइये। 

धन्यवाद लेख को पूरा पढ़ने के लिए।

D.T

Saturday, September 11, 2021

पृथ्वी के बारे मे कुछ महत्वपूर्ण बातें जिन्हें जानना आपके लिए बेहद जरुरी है/Some important things about Earth that you need to know

पृथ्वी सौरमण्डल का एक ग्रह है। यह दूरी के आधार पर सूर्य से तीसरा ग्रह है। बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल जैसे चार स्थलीय ग्रहों में से सबसे बड़ा है पृथ्वी ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन पाया जाता है। इसकी सतह का 71% भाग जल से तथा 29% भाग भूमि से ढका हुआ है। इसकी सतह विभिन्न प्लेटों से बनी हुई है। इस पर पानी तीनो अवस्थाओं में पाया जाता है जल, वाष्प और ठोस अवस्था। इसके दोनों ध्रुवों पर बर्फ की एक मोटी परत है। रेडियोमेट्रिक डेटिंग अनुमान और अन्य सबूतों के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति 4.54 अरब साल पहले हुई थी। 1913 में सबसे पहले फ्रांसीसी भौतिक शास्त्र चार्ल्स हेनरी ने ओजोन परत की खोज की थी। ओजोन परत अपने 97 से 99 फ़ीसदी तक सूरज की मध्यम फ्रीक्वेंसी की अल्ट्रावायलेट किरणों को पृथ्वी तक आने नहीं देती और पृथ्वी को बड़े नुकसान से बचाएं रहती है। ओजोन परत धरती का रक्षा कवच है। सूर्य का पृथ्वी की कक्षा में अपनी gravity को लगाना। यही वह कारण है जिसके कारण पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है. जिस प्रकार चंद्रमा पृथ्वी gravity के कारण पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटता रहता है. और इसी तरह सौरमंडल के सारे ग्रह सूर्य के gravity के कारण ही सूर्य के चारों ओर चक्कर काटते रहते हैं सूर्य के कर्वेचर की वजह से वह सूर्य के गोल curve की तरफ गिरती चली जाती है. मतलब गोल सूर्य के वक्र पृष्ठ की तरफ मुड़ती हुई सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती चली जाती है. और इसी कारण से पृथ्वी सूर्य से बंधी हुई है और अंतरिक्ष में टिकी हुई है। पृथ्वी में जीवन की शुरुवात को 3.3 अरब वर्ष  (3.3 Billion Years)पहले माना जाता है। सौर मंडल (Solar System Hindi) में आठ ग्रहों में पृथ्वी पांचवा सबसे बड़ा ग्रह है।

पृथ्वी का वायु-मंडल:

सतह पर दाब- 101.325 किलो पास्कल (मासत)

संघटन78.08% नाइट्रोजन (N2)[2] (शुष्क हवा)

20.95% ऑक्सीजन (O2)

0.930% आर्गन

0.039% कार्बन डाईऑक्साइड[15]

~ 1% जलवाष्प (जलवायु-चर)

Earth Planet Profile – पृथ्वी की रूपरेखा:

Equatorial Diameter (भूमध्य व्यास) :

12,756 km

Polar Diameter (पोलर व्यास) :

12,714 km

Mass (द्रव्यमान) :

5.97 x 10^24 kg

Moons (चंद्रमा) :

चंद्रमा

Orbit Distance (कक्षा) :

149,598,262 km (1 AU)

Orbit Period (सूर्य का एक चक्कर) :

365.24 दिन

Surface Temperature (सतह का तापमान) :

-88 to 58°C

Escape Velocity (पलायन वेग) :

11.186 km/s


पृथ्वी की रचना में निम्नलिखित तत्वों का योगदान है:

1.     34.6% आयरन

2.     29.5% आक्सीजन

3.     15.2% सिलिकन

4.     12.7% मैग्नेशियम

5.     2.4% निकेल

6.     1.9% सल्फर

7.     0.05% टाइटेनियम

8.     शेष अन्य

कुछ महत्वपूर्ण बिंदु :


एक पौराणिक कथा के अनुसार, महाराज पृथु के नाम पर इसका नाम पृथ्वी रखा गया। इसके अन्य नामो में- धरा, भूमि, धरित्री, रसा, रत्नगर्भा इत्यादि सम्मलित हैं।

हर साल अप्रैल महीना की 22 तारिख को पृथ्वी दिवस और 5 जून के पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

भूमध्य रेखा पर पृथ्वी का व्यास, अक्ष-से-अक्ष के व्यास से 43 किलोमीटर (27 मील) ज्यादा बड़ा है। इस प्रकार पृथ्वी के केन्द्र से सतह की सबसे लम्बी दूरी, इक्वाडोर के भूमध्यवर्ती चिम्बोराज़ो ज्वालामुखी का शिखर तक की है।

पृथ्वी, एक बिलियर्ड गेंद के आकार में सिकुड़ जाये तो, पृथ्वी के कुछ क्षेत्रों जैसे बड़े पर्वत शृंखलाएँ और महासागरीय खाईयाँ, छोटे खाइयों की तरह महसूस होंगे, जबकि ग्रह का अधिकतर भू-भाग, जैसे विशाल हरे मैदान और सूखे पठार आदि, चिकने महसूस होंगे। 

धरती का घनत्व पूरे सौरमंडल मे सबसे ज्यादा है। बाकी चट्टानी ग्रह की संरचना कुछ अंतरो के साथ पृथ्वी के जैसी ही है। चन्द्रमा का केन्द्रक छोटा है, बुध का केन्द्र उसके कुल आकार की तुलना मे विशाल है, मंगल और चंद्रमा का मैंटल कुछ मोटा है, चन्द्रमा और बुध मे रासायनिक रूप से भिन्न भूपटल नही है, सिर्फ पृथ्वी का अंत: और बाह्य मैंटल परत अलग है। ध्यान दे कि ग्रहो (पृथ्वी भी) की आंतरिक संरचना के बारे मे हमारा ज्ञान सैद्धांतिक ही है।

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना शल्कीय अर्थात परतों के रूप में है जैसे प्याज के छिलके परतों के रूप में होते हैं। इन परतों की मोटाई का सीमांकन रासायनिक विशेषताओं अथवा यान्त्रिक विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है। यांत्रिक लक्षणों के आधार पर पृथ्वी, स्थलमण्डल, दुर्बलता मण्डल, मध्यवर्ती आवरण, बाह्य सत्व(कोर) और आन्तरिक सत्व(कोर) से बना हुआ हैं। रासायनिक संरचना के आधार पर इसे भूपर्पटी, ऊपरी आवरण, निचला आवरण, बाहरी सत्व(कोर) और आन्तरिक सत्व(कोर) में बाँटा गया है।

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के बारे में जानकारी का स्रोतों को दो हिस्सों में विभक्त किया जा सकता है। प्रत्यक्ष स्रोत, जैसे ज्वालामुखी से निकले पदार्थो का अध्ययन, वेधन से प्राप्त आँकड़े इत्यादि, कम गहराई तक ही जानकारी उपलब्ध करा पते हैं। दूसरी ओर अप्रत्यक्ष स्रोत के रूप में भूकम्पीय तरंगों का अध्ययन अधिक गहराई की विशेषताओं के बारे में जानकारी देता है।

पृथ्वी की आंतरिक गर्मी, अवशिष्ट गर्मी के संयोजन से आती है ग्रहों में अनुवृद्धि से (लगभग 20%) और रेडियोधर्मी क्षय के माध्यम से (80%) ऊष्मा उत्पन्न होती हैं। पृथ्वी के भीतर, प्रमुख ताप उत्पादक समस्थानिक (आइसोटोप) में पोटेशियम-40, यूरेनियम-238 और थोरियम-232 सम्मलित है। 

पृथ्वी के केन्द्र का तापमान 6,000 डिग्री सेल्सियस (10,830 डिग्री फ़ारेनहाइट) तक हो सकता है, और दबाव 360 जीपीए तक पहुंच सकता है। क्योंकि सबसे अधिक गर्मी रेडियोधर्मी क्षय द्वारा उत्पन्न होती है, वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि पृथ्वी के इतिहास की शुरुआत में, कम या आधा-जीवन के समस्थानिक के समाप्त होने से पहले, पृथ्वी का ऊष्मा उत्पादन बहुत अधिक था। 

धरती से औसतन ऊष्मा का क्षय 87 एमडब्ल्यू एम -2 है, वही वैश्विक ऊष्मा का क्षय 4.42×1013 डब्ल्यू हैं। कोर की थर्मल ऊर्जा का एक हिस्सा मेंटल प्लम्स द्वारा पृष्ठभागो की ओर ले जाया जाता है, इन प्लम्स से प्रबल ऊर्जबिन्दु तथा असिताश्म बाढ़ का निर्माण होता है। ऊष्माक्षय का अंतिम प्रमुख माध्यम लिथोस्फियर से प्रवाहकत्त्व के माध्यम से होता है, जिसमे से अधिकांश महासागरों के नीचे होता है क्योंकि यहाँ भु-पपर्टी, महाद्वीपों की तुलना में बहुत पतली होती है।

5 करोड़ से 5.5 करोड़ वर्ष पहले ऑस्ट्रेलियाई प्लेट, भारतीय प्लेट के साथ जुड़ गई। सबसे तेजी से बढ़ते प्लेटें में महासागर की प्लेटें हैं, जिसमें कोकोस प्लेट 75 मिमी/ वर्ष की दर से बढ़ रही है। और वही प्रशान्त प्लेट 52-69 मिमी/वर्ष की दर से आगे बढ़ रही है। वही दूसरी ओर, सबसे धीमी गति से चलती प्लेट, यूरेशियन प्लेट है, जो 21 मिमी/वर्ष की एक विशिष्ट दर से बढ़ रही है।

धरती में ऐसे कई संसाधन हैं जिसका मनुष्यों द्वारा शोषण किया गया है अनवीकरणीय संसाधन जैसे कि जीवाश्म ईंधन, केवल भूवैज्ञानिक समय-कालों पर नवीनीकृत होते हैं। कोयला, पेट्रोलियम, और प्राकृतिक गैस आदि जीवाश्म ईंधन के बड़े भंडार पृथ्वी की सतह के अंदर से प्राप्त होते हैं। मनुष्यों द्वारा इन संशाधनो का उपयोग ऊर्जा उत्पादन तथा फीडस्टॉक के तौर पर रासायनिक उत्पादन के लिए किया जाता है। अयस्क उत्पत्ति की प्रक्रिया के माध्यम से खनिज अयस्क निकायों का भी निर्माण यही होता है। 

धरती में मनुष्य के लिए कई उपयोगी कई जैविक उत्पादों जैसे भोजन, लकड़ी, औषधि, ऑक्सीजन और कई जैविक अपशिष्टों के पुनर्चक्रण सहित का उत्पादन होता है, भूमि आधारित पारिस्थितिकी तंत्र, ऊपरी मिट्टी और ताजे पानी पर निर्भर करता है, और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र जमीन से बाह कर आये पोषक तत्वों पर निर्भर करता है। 1980 में, पृथ्वी की जमीन की सतह के 5,053 मिलियन हैक्टेयर (50.53 मिलियन किमी2) क्षेत्र पर जंगल थे, 6,788 मिलियन हैक्टेयर (67.88 मिलियन किमी2) पर घास के मैदान और चरागाह थे, और 1,501 मिलियन हैक्टेयर (15.01 मिलियन किमी2) क्षेत्र पर फसल उगाया जाता था। 1993 में सिंचित भूमि की अनुमानित क्षेत्र 2,481,250 वर्ग किलोमीटर (958,020 वर्ग मील) था। भवन निर्माण करके मनुष्य भी भूमि पर ही रहते हैं।

चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। यह सौरमंडल का पाचवाँ सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी का एक चौथाई तथा द्रव्यमान 1/81 है। बृहस्पति के उपग्रह के बाद चन्द्रमा दूसरा सबसे अधिक घनत्व वाला उपग्रह है। सूर्य के बाद आसमान में सबसे अधिक चमकदार निकाय चन्द्रमा है। समुद्री ज्वार और भाटा चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण आते है। चन्द्रमा की तात्कालिक कक्षीय दूरी, पृथ्वी के व्यास का 30 गुना है इसीलिए आसमान में सूर्य और चन्द्रमा का आकार हमेशा सामान नजर आता है। पृथ्वी के मध्य से चन्द्रमा के मध्य तक कि दूरी 384,403 किलोमीटर है। यह दूरी पृथ्वी कि परिधि के 30 गुना है। चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 1/6 है। यह पृथ्वी की परिक्रमा 27.3 दिन मे पूरा करता है और अपने अक्ष के चारो ओर एक पूरा चक्कर भी 27.3 दिन में लगाता है। यही कारण है कि हम हमेशा चन्द्रमा का एक ही पहलू पृथ्वी से देखते हैं। यदि चन्द्रमा पर खड़े होकर पृथ्वी को देखे तो पृथ्वी साफ़-साफ़ अपने अक्ष पर घूर्णन करती हुई नजर आएगी लेकिन आसमान में उसकी स्थिति सदा स्थिर बनी रहेगी अर्थात पृथ्वी को कई वर्षो तक निहारते रहो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं होगी। पृथ्वी- चन्द्रमा-सूर्य ज्यामिति के कारण "चन्द्र दशा" हर 29.5 दिनों में बदलती है।

Monday, July 6, 2020

Method To Darken Hair From Roots Naturally

The magic of Coffee will also work on hair

Coffee:

a)    Coffee Use with Mehndi



It may be a good idea to use coffee with henna to color the hair. For this, mix mehndi and coffee and make a paste with the help of water. Now apply it in your hair and leave it for about half an hour. After that wash the hair. If you want to give your hair a radish look then use more mehndi, while use more coffee for brown color. Keep this quantity according to the length of your hair.
b)    Coffee Spray

Some people do not know how to color hair properly.
In such a situation, take help of coffee spray. For this,
mix two cups of black coffee in water and prepare a
liquid. Now pour it into a spray bottle. Before using
this coffee spray, wash your hair with shampoo.
After this, apply coffee spray to the hair, comb the hair,so that the color is well applied from the roots of the hair to the entire length. If you have short hair, then after using this spray you can also do a light massage. Leave it this way for about half an hour, finally wash the hair.
c)    Hair Dye

With the help of hair dye coffee, you can also make a great natural hair dye. To make it, take half a cup of coffee and boil it in water and heat it. Now keep it to cool down. After this, you take a second bowl and mix a cup of hair conditioner and a tablespoon organic instant coffee. Now mix the previously prepared coffee water in this mixture well. Apply this hair dye to the hair and cover all the hair with a shower cap. Leave it this way for about an hour. After this wash the hair with shampoo. This hair dye gives your hair a great brown color. If you want to darken your hair more then you can also add a little cocoa powder to it.


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